स्त्रीवादी आंदोलन, विचारधारा या न्याय: किसे चुनें?
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने पत्रकार उमर राशिद के खिलाफ स्वतः संज्ञान लिया है , जब एक वायरल इंस्टाग्राम पोस्ट में एक महिला ने बलात्कार , यौन शोषण , शारीरिक हमला , मानसिक उत्पीड़न तथा धार्मिक और सांस्कृतिक अपमान जैसे गंभीर आरोप लगाए । यह प्रकरण सिर्फ एक व्यक्ति विशेष के आचरण को लेकर सवाल नहीं उठाता , बल्कि यह पूरे प्रगतिशील खेमे के भीतर की उस चुप्पी और पक्षधरता को भी उजागर करता है , जो आज नारीवाद की विश्वसनीयता पर संकट बनकर उभर रही है। पीड़िता ने अपनी पोस्ट में स्वीकार किया कि वह एक "प्रगतिशील" और "सेक्युलर" व्यक्ति के शोषण का शिकार बनीं , लेकिन बोलने में वर्षों लग गए—इस डर से कि दक्षिणपंथी ताकतें इस प्रकरण को "लव-जिहाद" के नाम पर भुना लेंगी । यह डर राजनीतिक प्रतिक्रिया से ज़्यादा उस सांस्कृतिक दबाव की उपज है , जो आज बौद्धिक तबकों में गहराई से मौजूद है—जहाँ उत्पीड़न की सच्चाई से अधिक यह मायने रखता है कि सच बोलने से किस विचारधारा को "नुकसान" होगा। इस पूरे मामले जो प्रश्न उठा रहे हैं , वे न केवल स्त्री विमर्श की सीमाओं की ओर संकेत कर...
